वो मेरे सामने बैठा तो रहा देर तलक,
दरमियाँ फिर भी कोई हिजाब रहा।
उसने जाते हुए बस इतना कहा, “ठीक हूँ”,
उसके लहजे में मगर कुछ तो अज़ाब रहा।
रात भर नींद नहीं आई तो समझ में आया,
मेरे कमरे में भी उसका ख़्वाब रहा।
वक़्त गुज़रा तो कई ज़ख़्म भी भरते गए,
मगर एक चेहरा था जो दिल में बेहिसाब रहा।
No comments:
Post a Comment