वो जो कहते थे
तुम्हारे बिन एक पल भी न रह पाएंगे
जी न पाएंगे
मर जाएंगे
तुम घर हो और ख़ुदा का दर भी
उसने मेरे ही शहर में अपना घर सजाया है
घर को ही इबादतगाह बनाया है
उसे झुठलाए पर शर्म की बात होगी
ये शै तो मेरे नाम होगी
~ After reading 'Jaun'
वो जो कहते थे
तुम्हारे बिन एक पल भी न रह पाएंगे
जी न पाएंगे
मर जाएंगे
तुम घर हो और ख़ुदा का दर भी
उसने मेरे ही शहर में अपना घर सजाया है
घर को ही इबादतगाह बनाया है
उसे झुठलाए पर शर्म की बात होगी
ये शै तो मेरे नाम होगी
~ After reading 'Jaun'
हर पल का हिसाब रखा
तेरी आमद के लिए
पर मेरे इंतजार का
कोई हिसाब नहीं मिला
किताबों के ढेर में
हर मौसम, बहार मिली
पर किसी किताब में
सूखा गुलाब नहीं मिला
उसने ख़त में अपने सारे
जज़्बात लिख दिए
बस मेरे सवाल का
कोई जवाब नहीं मिला
नज़र ने ढूँढा जिसे
वो इंतख़ाब नहीं मिला
वो शख्स तो मिला मगर
उसका हिजाब नहीं मिला
मुझे तुझ से यूँ तो
कोई शिकायत नहीं है फिर भी
मैं भी आज तुझ से
बेवजह रूठ कर देखूँ
यूँ तो मुझे रक़ीब पे
ज़्यादा यक़ीन है लेकिन
चल तेरी दोस्ती पे भी
एक दाँव लगाकर देखूँ
ख़ुदा के मौजूदगी पे
यक़ीन नहीं है मुझको
चलो तुम्हारी ख़ातिर
मुनाजात भी कर के देखूँ
मैं तुझे न पुकारूँ
बस याद कर के देखूँ
या अपनी तन्हाई को
एक शम्स बनाकर देखूँ
~ Vishal
मुझे लगता है कि क़लम से काग़ज़ पर कविता लिखना
बस एक रिवायत है,
असली कविता तो प्रेमी के लबों से
प्रेमिका की नंगी पीठ पर लिखी जाती है।
ना कोई स्याही,
ना किसी पन्नों की सरसराहट,
सिर्फ़ साँसों की गर्मी
और दिल की आहट।
क्योंकि कविता पढ़ी नहीं,
महसूस की जाती है।
~ Vishal
शायद
तुमने इस शहर के
उस मौसम को खो दिया
जो सबसे हसीन है
ये बहार, ये खुशबू तुम्हें पसंद आती
ये रंग तुम्हें अपने रंग में रंग लेते
कड़कती धूप में हम घर से निकलते
गुलमोहर की छाँव की बात करते
किसी टपरी पर चाय का गिलास हाथ लिए
ऊँची इमारतों की बात करते
ग़ज़लों पे, किताबों पे बात करते
हमारे इतने अलग ख़यालों पे बात करते
ख़ैर
अगले बरस ये मौसम फिर लौट आएगा
और
शायद तुम भी लौट आओ
~ विशाल
मैंने तुम पर कविता लिखी है
हालाँकि हो एक कविता तुम ख़ुद ही
हाँ पर किसी गुलमोहर के नीचे
मैंने तुम्हें पढ़ कर सुनाई नहीं
तेरी ज़ुल्फ़ों को शाम न लिखा
तेरे लबों को गुलाब न लिखा
किसी रिवायत के मुताबिक़ मैंने तुझे
चाँद भी न लिखा
मैंने समंदर को तेरे क़िस्से सुनाए
कई बार तेरा ज़िक्र किया
लहरों को तेरी धुन से वाक़िफ़ किया
रेत पर तेरा नाम लिखा
हवाओं से भी राज़ साझा किया
किसी शाम से बात छुपाई नहीं
हाँ तुम्हें कभी ये कविता
बस पढ़ कर सुनाई नहीं
— विशाल
ऐसा क्यूँ हो
कि मैं तुम पर ही कविता लिखूँ
ऐसा क्यूँ हो
कि मुझे
तेरे ख़यालों में ही
शब्द मिले
ऐसा क्यूँ हो
कि तेरी बेमौजूदगी
खलने लगती है
ऐसा क्यूँ हो
कि मेरा होना भी
बेमालूम सा
लगता है
ऐसा क्यूँ हो
कि तुम्हारा
दो लफ़्ज़ों का ख़त
मायने रखता है
ऐसा क्यूँ हो
कि मैं
उस ख़त का
जवाब
न दे पाऊँ
ऐसा क्यूँ हो
कि
“तुम कैसी हो”
ये पूछना भी
इतना मुश्किल है
ऐसा क्यूँ हो
कि
“अपना ख़याल रखना”
ये कहना भी
आसान
नहीं
मैं तुझको पढ़ कर तेरी जबां में लिख रहा हूं
मैं फिर मादरी जबां में कुछ लिखना चाहता हूं
सिर्फ हमबिस्तर हो जाना काफी नहीं तेरा मेरा
मैं तुझे गले लगा कर खूब रोना चाहता हूं
सुना है तेरे शहर के रास्ते भुलभुलैया से है
तेरे शहर के रास्तों में खो जाना चाहता हूं
अगर नशे में हो तुझको भूल जाना मुमकिन
मैं मेरे आंगन में एक मैकदा बनाना चाहता हूं
~ विशाल
वो हर पत्थर पर अपना नाम तराशती गई,
मैं हर लकीर से अपनी पहचान मिटाता गया
उसकी आहट से पहले, बाग़ था वीरान सा,
फिर एक बोतल टूटी, और अत्तर महकता गया
मैंने बिस्तर की सिलवटों को संजोग रखा है वैसे ही
जब भी गूंजी घुंगरू की सदा, मैं और पिता गया
मुझे तेरा शहर कभी रास न आएगा
मैं जिस भी गली से गुजरा तेरी यादों का था साया
~ विशाल