तुमसे ख़्वाब में भी मुहब्बत गुनाह हो जाना
मेरे लब तक आना और फ़ना हो जाना
मेरी रूह का तेरे दर्द से राब्ता हो जाना
और फिर तेरी ख़ामोशी ही पनाह हो जाना
तेरी यादों का मेरी साँसों में बसना यूँ,
जैसे हर धड़कन का कोई गवाह हो जाना।
मेरी नज़्मों में कहीं भी तेरा ज़िक्र नहीं,
और खामोशियों में तेरा बयाँ हो जाना।
मैंने चाहा भी तुझे, और इन्कार भी रखा,
ये मुहब्बत का अजब सा निज़ाम हो जाना।
मैं नज़्म था तेरा, जो लफ़्ज़ों में उतर न सका,
तू एक सफ़ह था - और मुझमें ही गुमाँ हो जाना।
~ Vishal