ऐसा क्यूँ हो
कि मैं तुम पर ही कविता लिखूँ
ऐसा क्यूँ हो
कि मुझे
तेरे ख़यालों में ही
शब्द मिले
ऐसा क्यूँ हो
कि तेरी बेमौजूदगी
खलने लगती है
ऐसा क्यूँ हो
कि मेरा होना भी
बेमालूम सा
लगता है
ऐसा क्यूँ हो
कि तुम्हारा
दो लफ़्ज़ों का ख़त
मायने रखता है
ऐसा क्यूँ हो
कि मैं
उस ख़त का
जवाब
न दे पाऊँ
ऐसा क्यूँ हो
कि
“तुम कैसी हो”
ये पूछना भी
इतना मुश्किल है
ऐसा क्यूँ हो
कि
“अपना ख़याल रखना”
ये कहना भी
आसान
नहीं