Monday, October 26, 2026

 

नेकी कर, दरिया में डाल, पर ध्यान रख,

कहीं दरिया डुबो न दे तुझको।


हर किसी के दर्द को अपना न बना,

अपना ही ग़म खा न जाए तुझको।


दिल बड़ा रख, मगर इतना भी नहीं,

तेरी मासूमी रुला न दे तुझको।


दोस्ती में भी ज़रा दूरी रख,

कोई अपना ही मिटा न दे तुझको।


हर किसी पर ऐतबार करना ठीक नहीं,

कोई झूठा यक़ीन बहका न दे तुझको।


राह में काँटे हैं, पत्थर भी बहुत,

तेरी मंज़िल से हटा न दे तुझको।


राह-ए-ज़िंदगी में सबक़ लेते हुए चल,

कोई गुज़रा हुआ कल सता न दे तुझको।


अपनी ख़ुशियों का भी रख थोड़ा हिसाब,

किसी की चाहत मिटा न दे तुझको।


वक़्त के साथ बदलना भी हुनर है मगर,

कोई दुनिया का रंग बदल न दे तुझको।

Sunday, October 25, 2026

 वाटलं तर नोंदव गुन्हा तू माझ्यावर,

तू नसतानाही कविता लिहिलीय तुझ्यावर.

मी तुझ्या आठवणींना हद्दपार करायचं ठरवलं,
पण मनानेच पुन्हा खटला भरला माझ्यावर.

तुला विसरण्याचे कितीतरी मार्ग शोधले मी,
प्रत्येक रस्ता येऊन थांबला तुझ्या दारावर.

आता माझ्या कवितांना दोष देऊ नकोस तू,
तुझंच नाव उमटतं अजुनी प्रत्येक अक्षरावर.

तुझ्याविरुद्ध एकही पुरावा नाही माझ्याकडे,
तरी मन रोज नवे आरोप ठेवतं तुझ्यावर.


Monday, October 19, 2026

 पाऊस आणि तुझ्या आठवणींत नातं काही खास असणार,

उगाच का मातीला तुझा गंध, थेंबांनी पैंजणांचा भास होणार?

Monday, October 12, 2026

 तुम मेरी नहीं, फिर भी ये ख़याल क्यों है,

तुम्हें खोने का दिल को मलाल क्यों है?


न कोई इकरार है, न कोई इनकार,

फिर तेरी आँखों में यूँ सवाल क्यों है?


माना मेरी हथेली पर तेरे नाम की लकीर न थी,

फिर तेरे बिना ये ज़िंदगी बेहाल क्यों है?


तेरा ज़िक्र छिड़े तो महफ़िल निखर जाती है,

तेरे ज़िक्र से ये महफ़िल बेमिसाल क्यों है?

Sunday, September 27, 2026

 सांग स्पष्ट ते, इशाऱ्यात बोलू नको


जमणार नाही उलगडणे कोडे मला


दाखवाया जगाला मंचावरती शेला दिला


मंचाखाली पायातले मारले जोडे मला


घालू शकणार नाही तू मोहिनी आता मला


कळू लागले तुझे डावपेच थोडे मला


मी ऐच्छिकतेने सर्व धर्म नाकारले


कोण तू, ठरवून एका जातीशी जोडे मला


 काश किसी को सुनाने को कोई कहानी होती,

तेरी मेरी मुहब्बत की इक निशानी होती।

काश मिलती मुझे फिर से वो गुज़री हुई सहर,
शायद फिर से मेरी आँखों में रवानी होती।

काश मिल जाती मुझे दोपहर के वक़्त,
शायद न ढली मेरी जवानी होती।

बस तेरे कंधे पे सर होता और हाथों में हाथ,
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में शाम सुहानी होती।

काश वो ख़त भी कहीं आज मुझे मिल जाता,
जिसमें हर बात तेरी मेरी ज़ुबानी होती।

अगर पूछे कोई मुझसे मेरी ख़्वाहिश क्या है,
तेरे संग बीती हुई एक शाम पुरानी होती।

काश लौट आता वो मौसम तेरे आने का कभी,
जिसमें मेरी दुनिया में न वीरानी होती।


Wednesday, September 23, 2026

 तुझे सारे रंग माझ्यात मिसळू दे

मी तुला माझा निळा रंग देतो


तू जिंकलेली बाजू घेऊन जा सारी

मी तुला हरण्याचा ढंग देतो


तुझ्या स्पर्शात शब्द हरवले ज्या क्षणी

मी तुला त्या क्षणाचा अभंग देतो

Tuesday, September 22, 2026

 मी पुन्हा कधी लिहिलं असतं? तू नसतीस तर

इमरोझ कसा मी झालो असतो? तू नसतीस तर


तुझं नाव आलं की शब्द उमलतात सारे,
ही कविता कोणाची असती? तू नसतीस तर


जखमांनाही तू दिलीस एक हळुवारशी भाषा,
मी किती पोळलो असतो? तू नसतीस तर


रोज आरशात भेटणारा चेहरा माझा नव्हता,
मी कुणाचा चेहरा असतो? तू नसतीस तर


Monday, September 7, 2026

 अब तुझसे भी नाराज़ हूँ मैं इसलिए,

तुझे देखा तो कोई और याद आया।

तेरे क़रीब था, फिर भी अजीब हालत थी,
पास रहकर भी कोई दूर याद आया।

तूने पूछा कि क्यों ख़ामोश हूँ इतना मैं,
क्या बताता कि कोई और याद आया।

तेरे आने से सजी महफ़िलें कुछ देर मगर,
तेरे जाने पर मुझे अपना घर याद आया।

अब किसी से भी शिकायत नहीं करता हूँ मैं,
जिससे रूठा था वही बार-बार याद आया।

तेरे क़दमों की आहट जब सुनाई दी मुझे,
किसी के लौटने का इंतज़ार याद आया।

तेरे जाने के बाद देर तलक सोचता रहा,
क्यों मुझे फिर वही इतवार याद आया।