तुझे सारे रंग माझ्यात मिसळू दे
मी तुला माझा निळा रंग देतो
तू जिंकलेली बाजू घेऊन जा सारी
मी तुला हरण्याचा ढंग देतो
तुझ्या स्पर्शात शब्द हरवले ज्या क्षणी
मी तुला त्या क्षणाचा अभंग देतो
तुझे सारे रंग माझ्यात मिसळू दे
मी तुला माझा निळा रंग देतो
तू जिंकलेली बाजू घेऊन जा सारी
मी तुला हरण्याचा ढंग देतो
तुझ्या स्पर्शात शब्द हरवले ज्या क्षणी
मी तुला त्या क्षणाचा अभंग देतो
मी पुन्हा कधी लिहिलं असतं? तू नसतीस तर
इमरोझ कसा मी झालो असतो? तू नसतीस तर
तुझं नाव आलं की शब्द उमलतात सारे,
ही कविता कोणाची असती? तू नसतीस तर
जखमांनाही तू दिलीस एक हळुवारशी भाषा,
मी किती पोळलो असतो? तू नसतीस तर
रोज आरशात भेटणारा चेहरा माझा नव्हता,
मी कुणाचा चेहरा असतो? तू नसतीस तर
अब तुझसे भी नाराज़ हूँ मैं इसलिए,
तुझे देखा तो कोई और याद आया।
तेरे क़रीब था, फिर भी अजीब हालत थी,
पास रहकर भी कोई दूर याद आया।
तूने पूछा कि क्यों ख़ामोश हूँ इतना मैं,
क्या बताता कि कोई और याद आया।
तेरे आने से सजी महफ़िलें कुछ देर मगर,
तेरे जाने पर मुझे अपना घर याद आया।
अब किसी से भी शिकायत नहीं करता हूँ मैं,
जिससे रूठा था वही बार-बार याद आया।
तेरे क़दमों की आहट जब सुनाई दी मुझे,
किसी के लौटने का इंतज़ार याद आया।
तेरे जाने के बाद देर तलक सोचता रहा,
क्यों मुझे फिर वही इतवार याद आया।
जो सुनाती है मुझे चाँद-तारों की कहानी,
मैं उसको कहानी तेरी सुनाता हूँ।
वो कहती है, “भूल जाओ जो बीत गया है,”
मैं बीते हुए कल की ताज़गी सुनाता हूँ।
उसे यक़ीन है कि वक़्त सब भुला देता है,
मैं वक़्त के ही भीतर उसकी कमी सुनाता हूँ।
वो पूछती है, “मोहब्बत में क्या बचा आख़िर?”
मैं टूटे हुए दिलों की ज़िंदगी सुनाता हूँ।
वो मेरे सामने बैठा तो रहा देर तलक,
दरमियाँ फिर भी कोई हिजाब रहा।
उसने जाते हुए बस इतना कहा, “ठीक हूँ”,
उसके लहजे में मगर कुछ तो अज़ाब रहा।
रात भर नींद नहीं आई तो समझ में आया,
मेरे कमरे में भी उसका ख़्वाब रहा।
वक़्त गुज़रा तो कई ज़ख़्म भी भरते गए,
मगर एक चेहरा था जो दिल में बेहिसाब रहा।
कभी याद आऊँ मैं भी, वक़्त मिले तो,
कभी याद आओ तुम भी, वक़्त मिले तो।
किताबों में दबे ख़त आज भी साँसें लेते हैं,
उन्हें पढ़ लेना कभी, वक़्त मिले तो।
तुम्हारे शहर में जब फिर से बारिश होगी,
मुझे सोचना कभी, वक़्त मिले तो।
वो जो कुछ कह न पाया, कविता में लिख दूँगा,
मुझे सुन लेना तुम भी, वक़्त मिले तो।
बहुत अरसे से तुम्हारा कोई ख़त नहीं आया,
मुझे लिख देना कुछ भी, वक़्त मिले तो।
भाकरीसाठी रांगेत उभा राहतो माणूस,
भाषणात प्रत्येकाच्या हातात राज आहे.
कुणाच्या वाट्याला टाळ्या, कुणाच्या वाट्याला आक्रोश,
एकाच शहरातील प्रत्येकाचा वेगळा प्रवास आहे.
घरं मोठी होत गेली, माणसं छोटी झाली,
प्रत्येक दाराआड आपापला समाज आहे.
जिंकूनही रोज हरतो आपण स्वतःशीच आतून,
या जगण्याच्या खेळाला नेमका कुठला इलाज आहे?
चेहऱ्यावरच्या हास्याला फार अर्थ देऊ नको,
आत कुठे किती तुटलो, याचा कोणाला अंदाज आहे?
जीते जी जिसे डर था मौत से,
मौत आई तो वो हँसता हुआ मिला।
उम्र भर जिसको माना मैंने रक़ीब,
आख़िरी पल वही देता दुआ मिला।
सच कहा तो हर किसी से रंजिश हुई,
झूठ कहा तो हर इक अपना मिला।
जिसे दुनिया ने समझा ख़ुशहाल,
उसके कमरे में तकिया गीला मिला।
घर लौटने की थी ख़ुशी बहुत मगर,
घर में इस बार एक कमरा कम मिला।
हक़ीक़त न सही, ख़्वाब में मिले
वो मुझे किसी भूले जवाब में मिले
बहुत दिनों से चेहरे पे धूप ठहरी थी
वो एक शाम किसी नक़ाब में मिले
न पूछ हाल मेरा, बस इतना याद रहे
हम अपने-आप से थोड़े अज़ाब में मिले
वो एक लम्हा भी कितना अजीब लम्हा था
कि जैसे उम्र किसी एक किताब में मिले
मैंने चाहा था उसे सिर्फ़ एक बार मगर
वो बार-बार मेरे इंतिख़ाब में मिले
न जाने कौन-सा मौसम था उस मुलाक़ात का
कि उम्र भर के सभी रंग उस गुलाब में मिले