मैंने तुम पर कविता लिखी है
हालाँकि हो एक कविता तुम ख़ुद ही
हाँ पर किसी गुलमोहर के नीचे
मैंने तुम्हें पढ़ कर सुनाई नहीं
तेरी ज़ुल्फ़ों को शाम न लिखा
तेरे लबों को गुलाब न लिखा
किसी रिवायत के मुताबिक़ मैंने तुझे
चाँद भी न लिखा
मैंने समंदर को तेरे क़िस्से सुनाए
कई बार तेरा ज़िक्र किया
लहरों को तेरी धुन से वाक़िफ़ किया
रेत पर तेरा नाम लिखा
हवाओं से भी राज़ साझा किया
किसी शाम से बात छुपाई नहीं
हाँ तुम्हें कभी ये कविता
बस पढ़ कर सुनाई नहीं
— विशाल