Saturday, February 14, 2026

 मैंने तुम पर कविता लिखी है  

हालाँकि हो एक कविता तुम ख़ुद ही  

हाँ पर किसी गुलमोहर के नीचे  

मैंने तुम्हें पढ़ कर सुनाई नहीं  


तेरी ज़ुल्फ़ों को शाम न लिखा  

तेरे लबों को गुलाब न लिखा  

किसी रिवायत के मुताबिक़ मैंने तुझे  

चाँद भी न लिखा  


मैंने समंदर को तेरे क़िस्से सुनाए  

कई बार तेरा ज़िक्र किया  

लहरों को तेरी धुन से वाक़िफ़ किया  

रेत पर तेरा नाम लिखा  


हवाओं से भी राज़ साझा किया  

किसी शाम से बात छुपाई नहीं  

हाँ तुम्हें कभी ये कविता  

बस पढ़ कर सुनाई नहीं  


— विशाल


Thursday, February 5, 2026


ऐसा क्यूँ हो
कि मैं तुम पर ही कविता लिखूँ

ऐसा क्यूँ हो
कि मुझे
तेरे ख़यालों में ही
शब्द मिले

ऐसा क्यूँ हो
कि तेरी बेमौजूदगी
खलने लगती है

ऐसा क्यूँ हो
कि मेरा होना भी
बेमालूम सा
लगता है

ऐसा क्यूँ हो
कि तुम्हारा
दो लफ़्ज़ों का ख़त
मायने रखता है

ऐसा क्यूँ हो
कि मैं
उस ख़त का
जवाब
न दे पाऊँ

ऐसा क्यूँ हो
कि
“तुम कैसी हो”
ये पूछना भी
इतना मुश्किल है

ऐसा क्यूँ हो
कि
“अपना ख़याल रखना”
ये कहना भी
आसान
नहीं

Thursday, October 10, 2024

मैं तुझको पढ़ कर तेरी जबां में लिख रहा हूं

मैं फिर मादरी जबां में कुछ लिखना चाहता हूं


सिर्फ हमबिस्तर हो जाना काफी नहीं तेरा मेरा

मैं तुझे गले लगा कर खूब रोना चाहता हूं


सुना है तेरे शहर के रास्ते भुलभुलैया से है

तेरे शहर के रास्तों में खो जाना चाहता हूं


अगर नशे में हो तुझको भूल जाना मुमकिन

मैं मेरे आंगन में एक मैकदा बनाना चाहता हूं


~ विशाल

Saturday, October 5, 2024

वो हर पत्थर पर अपना नाम तराशती गई,

मैं हर लकीर से अपनी पहचान मिटाता गया


उसकी आहट से पहले, बाग़ था वीरान सा,

फिर एक बोतल टूटी, और अत्तर महकता गया


मैंने बिस्तर की सिलवटों को संजोग रखा है वैसे ही

जब भी गूंजी घुंगरू की सदा, मैं और पिता गया


मुझे तेरा शहर कभी रास न आएगा 

मैं जिस भी गली से गुजरा तेरी यादों का था साया


~ विशाल

Sunday, September 29, 2024

 कैसे कहूं वो कैसा था

वो एक राज़ के जैसा था

टूट के जो मैं बिखर न जाऊं,

मुझे समेटे वैसा था।


हर दर्द में मरहम बनकर,

वो चुपके से आ बैठा था,

दो लफ्जों में अपना सा लगा,

वो कुछ शेर के जैसा था।


दूर था लेकिन पास लगा,

जैसे मेरा साया था,

सांसों में उसकी खुशबू थी,

और नाम लबों पे छाया था।


~ विशाल 


Saturday, September 28, 2024

 


चाहता हूं तुझ पे एक किताब लिखूं

तेरे मेरे सारे ख़्वाब लिखूं 

पर किस लफ्जों में बयां करूं

तुझे सुबह लिखूं या शब लिखूं 


तेरी आंखों का शरार लिखूं 

दिल की हर बात, जज्बात लिखूं

चांद को छुपाके तुझे

चांदनी रात लिखूं


कभी तुझे मैं घर लिखूं

कभी तुझे मैं प्यार लिखूं

कुछ सच कुछ झूठ लिखूं

कभी मज़लूम, कभी गुनहगार लिखूं


चाहता हूं तुझ पे एक किताब लिखूं

तेरे मेरे सारे ख़्वाब लिखूं 


~ विशाल 


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जब आंख खुली तो अक्सर

मैं पूछता हूं खुद से

कल रात छलावे जैसा

कौन था मेरी बाहों में


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हाँ ये सच है शाम मुस्कुराती भी है

चांदनी धीरे-धीरे जगमगाती भी हैं

तुम मेरे साथ किनारों पे चलना

लहरें गुनगुनाती भी हैं


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मी कितीही टाळले 

तरी येतोच तुझा उल्लेख

तुझ्याशिवाय माझी प्रत्येकच

कविता निःशेष

Saturday, June 22, 2024

 या वाटेवर एकाकी मी चालत असताना

तुझ्या आठवणी मनात गोंधळ घालत येताना

हृदयाची सम चुकते त्यांना वेचत जाताना


तुझ्याशिवायचा प्रत्येक मी पाऊस टाळत राहिलो

तुझ्यासवेचा पाऊस फक्त मनात माळत राहिलो

खिडकीतूनच पाहिले मी आभाळ दाटत येताना


हे प्रेमगीत विरहगीत झाले कसे

फुलांवर लिहिताना काटे आले कसे

शब्दांना कशी कळते वेदना?


वसंतमागे मी शिशिर दडवून ठेवले

स्वतःशी ही काही खरं काही खोटं बोलून पाहले

गळलेल्या पानांची रास रीचत जाताना




तुझ्या भिजण्याने पावसाळा व्हायचा

आता पावसामध्ये ती बात नाही


तुझ्या भेटीने फुलांचे बहरणे

वसंतामध्ये ती बात नाही


श्वासांनीच खरे बोलणे व्हायचे 

शब्दांमध्ये ती बात नाही


तुझ्या स्पर्शाने गंधाळणे माझे 

अत्तरामध्ये ती बात नाही


तुझ्या सोबती मीच कळलो मला 

आरश्यामध्ये ती बात नाही


~ विशाल


Tuesday, June 18, 2024

 


जेव्हा पहिल्यांदा पाहिलं

तुला बटांशी खेळताना

पांढऱ्याशुभ्र साडीमध्ये

गुलाबी हसताना


वाटलं वसंत फुलला असावा

बहर आला असावा

किंवा स्वप्न आणि वास्तविकतेचा

तो क्षण दुवा असावा


तू खरंच होतीस का?

मी चिमटा काढून बघायला हवं होतं 

काहीतरी कारण काढून तुझ्याशी

बोलायला हवं होतं


खऱ्या होत असतील

पुस्तकातल्या कथा कदाचित

स्वप्न उद्याची चाहूल असेल

कदाचित


तिला चंद्र उगाच नसतील म्हणत

गुलाबाशी तुलना उगाच नसतील करत

तिला त्याच्या नजरेतून बघावं

तुला बघितलं तेव्हा वाटलं