का जाणे कसे हात माझे बांधले,
तुला बिलगण्याची आस बाकी राहिली.
गारवा का वाटतो नकोनकोसा,
का वाटते ऊन माझी सावली.
का दिसतात आरशात चेहरे धूसर,
का तुझी चाहूल मात्र स्पष्ट राहिली.
का सागरालाही तहान लागते,
का नदी किनाऱ्यावाचून वाहिली.
का जाणे कसे हात माझे बांधले,
तुला बिलगण्याची आस बाकी राहिली.
गारवा का वाटतो नकोनकोसा,
का वाटते ऊन माझी सावली.
का दिसतात आरशात चेहरे धूसर,
का तुझी चाहूल मात्र स्पष्ट राहिली.
का सागरालाही तहान लागते,
का नदी किनाऱ्यावाचून वाहिली.
दिल ने भी रख छोड़ा है इक इंतज़ार तेरे लिये,
नजरेत दडवला मी चांदण्यांचा व्यापार तुझ्यासाठी।
दर्द ने सीखा दिया आँखों को मुस्कुराना भी,
अश्रूंनी घडवला मग मोत्यांचा हार तुझ्यासाठी।
चाँद ने दरिया में अपना अक्स उतारा चुपके से,
लाटांनी केला पहारा सारी रात्र तुझ्यासाठी।
दिल की वीरानी में इक शेर अभी तक ज़िंदा है,
मीच जाळला त्याचा प्रत्येक उच्चार तुझ्यासाठी।
धूप ने पत्तों पे लिख दी एक सुनहरी दास्ताँ,
फांद्यांनी धरला त्या कथांचा आधार तुझ्यासाठी।
थोड़ी देर रुक जाओ, अभी तो रात बाकी है,
खामोशियों की तह में एक मुलाकात बाकी है।
तुम अगर सुन लो तो मुकम्मल हो ये अफ़साना,
मेरी ख़ामोशी में अभी कुछ बयानात बाकी हैं।
चाँद भी ठहरा हुआ है आसमान की देहलीज़ पर,
सितारों की आँखों में कुछ सवालात बाकी हैं।
यूँ तो नज़रों ने कई दफ़ा कह दी दास्ताँ अपनी,
मगर दिल के सफ़्हों पर कुछ एहसासात बाकी हैं।
वक़्त की रेत ने ढक दिए हैं कई क़िस्से मगर,
तेरी यादों के अभी कुछ निशानात बाकी हैं।
न जाओ इस क़दर कि रात अधूरी रह जाए,
कि इस रात में अभी कुछ जज़्बात बाकी हैं।
मैंने तुझसे तो बे-लौस ही तअल्लुक़ चाही,
तेरी जानिब से भी अपनी न कोई तस्दीक़ चाही।
तुझसे मोहब्बत की ये शिद्दत ही काफ़ी थी मुझे,
और न इस दिल ने कोई और तौफ़ीक़ चाही।
दिल ने हर ख़्वाब तेरे नाम से रौशन कर के,
ख़ुद से भी फिर न कोई और तहरीक़ चाही।
तेरे क़दमों की सदा में ही मुझे मिला सुकूँ,
और दुनिया से न कोई भी तरतीब चाही।
तू मिला तो लगा जैसे मिली हो मंज़िल मुझको,
और फिर तक़दीर से भी कोई न तदबीर चाही।
~ Vishal
तुमसे ख़्वाब में भी मुहब्बत गुनाह हो जाना
मेरे लब तक आना और फ़ना हो जाना
मेरी रूह का तेरे दर्द से राब्ता हो जाना
और फिर तेरी ख़ामोशी ही पनाह हो जाना
तेरी यादों का मेरी साँसों में बसना यूँ,
जैसे हर धड़कन का कोई गवाह हो जाना।
मेरी नज़्मों में कहीं भी तेरा ज़िक्र नहीं,
और खामोशियों में तेरा बयाँ हो जाना।
मैंने चाहा भी तुझे, और इन्कार भी रखा,
ये मुहब्बत का अजब सा निज़ाम हो जाना।
मैं नज़्म था तेरा, जो लफ़्ज़ों में उतर न सका,
तू एक सफ़ह था - और मुझमें ही गुमाँ हो जाना।
~ Vishal
मुझको भरम था इश्क़ है, दरिया का साहिल कहना,
दिल को मगर पड़ा है अब खुद से ही ग़ाफ़िल कहना।
आँखों से रात भर आँसू जो बेआवाज़ गिरे,
सुबह हुई तो उसे दर्द का हासिल कहना।
बाप ने सर पे हाथ जो रक्खा तो यूँ लगा,
उम्र भर उस ही लम्हे को रहा “काबिल” कहना।
महफ़िल में लोग थे, हर एक अपने में मगन,
हम ही को आ गया खुद को यहाँ जाहिल कहना।
दिल टूट के भी रहा उस ही गली में आख़िर,
अपनी ही ज़िद को ठहरा इश्क़ का क़ातिल कहना।
वो जो कहते थे
तुम्हारे बिन एक पल भी न रह पाएंगे
जी न पाएंगे
मर जाएंगे
तुम घर हो और ख़ुदा का दर भी
उसने मेरे ही शहर में अपना घर सजाया है
घर को ही इबादतगाह बनाया है
उसे झुठलाए पर शर्म की बात होगी
ये शै तो मेरे नाम होगी
~ After reading 'Jaun'
हर पल का हिसाब रखा
तेरी आमद के लिए
पर मेरे इंतजार का
कोई हिसाब नहीं मिला
किताबों के ढेर में
हर मौसम, बहार मिली
पर किसी किताब में
सूखा गुलाब नहीं मिला
उसने ख़त में अपने सारे
जज़्बात लिख दिए
बस मेरे सवाल का
कोई जवाब नहीं मिला
नज़र ने ढूँढा जिसे
वो इंतख़ाब नहीं मिला
वो शख्स तो मिला मगर
उसका हिजाब नहीं मिला
मुझे तुझ से यूँ तो
कोई शिकायत नहीं है फिर भी
मैं भी आज तुझ से
बेवजह रूठ कर देखूँ
यूँ तो मुझे रक़ीब पे
ज़्यादा यक़ीन है लेकिन
चल तेरी दोस्ती पे भी
एक दाँव लगाकर देखूँ
ख़ुदा के मौजूदगी पे
यक़ीन नहीं है मुझको
चलो तुम्हारी ख़ातिर
मुनाजात भी कर के देखूँ
मैं तुझे न पुकारूँ
बस याद कर के देखूँ
या अपनी तन्हाई को
एक शम्स बनाकर देखूँ
~ Vishal