Sunday, September 27, 2026

 सांग स्पष्ट ते, इशाऱ्यात बोलू नको


जमणार नाही उलगडणे कोडे मला


दाखवाया जगाला मंचावरती शेला दिला


मंचाखाली पायातले मारले जोडे मला


घालू शकणार नाही तू मोहिनी आता मला


कळू लागले तुझे डावपेच थोडे मला


मी ऐच्छिकतेने सर्व धर्म नाकारले


कोण तू, ठरवून एका जातीशी जोडे मला


 काश किसी को सुनाने को कोई कहानी होती,

तेरी मेरी मुहब्बत की इक निशानी होती।

काश मिलती मुझे फिर से वो गुज़री हुई सहर,
शायद फिर से मेरी आँखों में रवानी होती।

काश मिल जाती मुझे दोपहर के वक़्त,
शायद न ढली मेरी जवानी होती।

बस तेरे कंधे पे सर होता और हाथों में हाथ,
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में शाम सुहानी होती।

काश वो ख़त भी कहीं आज मुझे मिल जाता,
जिसमें हर बात तेरी मेरी ज़ुबानी होती।

अगर पूछे कोई मुझसे मेरी ख़्वाहिश क्या है,
तेरे संग बीती हुई एक शाम पुरानी होती।

काश लौट आता वो मौसम तेरे आने का कभी,
जिसमें मेरी दुनिया में न वीरानी होती।


Wednesday, September 23, 2026

 तुझे सारे रंग माझ्यात मिसळू दे

मी तुला माझा निळा रंग देतो


तू जिंकलेली बाजू घेऊन जा सारी

मी तुला हरण्याचा ढंग देतो


तुझ्या स्पर्शात शब्द हरवले ज्या क्षणी

मी तुला त्या क्षणाचा अभंग देतो

Tuesday, September 22, 2026

 मी पुन्हा कधी लिहिलं असतं? तू नसतीस तर

इमरोझ कसा मी झालो असतो? तू नसतीस तर


तुझं नाव आलं की शब्द उमलतात सारे,
ही कविता कोणाची असती? तू नसतीस तर


जखमांनाही तू दिलीस एक हळुवारशी भाषा,
मी किती पोळलो असतो? तू नसतीस तर


रोज आरशात भेटणारा चेहरा माझा नव्हता,
मी कुणाचा चेहरा असतो? तू नसतीस तर


Monday, September 7, 2026

 अब तुझसे भी नाराज़ हूँ मैं इसलिए,

तुझे देखा तो कोई और याद आया।

तेरे क़रीब था, फिर भी अजीब हालत थी,
पास रहकर भी कोई दूर याद आया।

तूने पूछा कि क्यों ख़ामोश हूँ इतना मैं,
क्या बताता कि कोई और याद आया।

तेरे आने से सजी महफ़िलें कुछ देर मगर,
तेरे जाने पर मुझे अपना घर याद आया।

अब किसी से भी शिकायत नहीं करता हूँ मैं,
जिससे रूठा था वही बार-बार याद आया।

तेरे क़दमों की आहट जब सुनाई दी मुझे,
किसी के लौटने का इंतज़ार याद आया।

तेरे जाने के बाद देर तलक सोचता रहा,
क्यों मुझे फिर वही इतवार याद आया।


Thursday, September 3, 2026

 जो सुनाती है मुझे चाँद-तारों की कहानी,


मैं उसको कहानी तेरी सुनाता हूँ।


वो कहती है, “भूल जाओ जो बीत गया है,”


मैं बीते हुए कल की ताज़गी सुनाता हूँ।


उसे यक़ीन है कि वक़्त सब भुला देता है,


मैं वक़्त के ही भीतर उसकी कमी सुनाता हूँ।


वो पूछती है, “मोहब्बत में क्या बचा आख़िर?”


मैं टूटे हुए दिलों की ज़िंदगी सुनाता हूँ।


Wednesday, August 26, 2026

 वो मेरे सामने बैठा तो रहा देर तलक,

दरमियाँ फिर भी कोई हिजाब रहा।

उसने जाते हुए बस इतना कहा, “ठीक हूँ”,
उसके लहजे में मगर कुछ तो अज़ाब रहा।

रात भर नींद नहीं आई तो समझ में आया,
मेरे कमरे में भी उसका ख़्वाब रहा।

वक़्त गुज़रा तो कई ज़ख़्म भी भरते गए,
मगर एक चेहरा था जो दिल में बेहिसाब रहा।


 कभी याद आऊँ मैं भी, वक़्त मिले तो,

कभी याद आओ तुम भी, वक़्त मिले तो।


किताबों में दबे ख़त आज भी साँसें लेते हैं,

उन्हें पढ़ लेना कभी, वक़्त मिले तो।


तुम्हारे शहर में जब फिर से बारिश होगी,

मुझे सोचना कभी, वक़्त मिले तो।


वो जो कुछ कह न पाया, कविता में लिख दूँगा,

मुझे सुन लेना तुम भी, वक़्त मिले तो।


बहुत अरसे से तुम्हारा कोई ख़त नहीं आया,

मुझे लिख देना कुछ भी, वक़्त मिले तो।

Thursday, August 20, 2026

 भाकरीसाठी रांगेत उभा राहतो माणूस,

भाषणात प्रत्येकाच्या हातात राज आहे.


कुणाच्या वाट्याला टाळ्या, कुणाच्या वाट्याला आक्रोश,

एकाच शहरातील प्रत्येकाचा वेगळा प्रवास आहे.


घरं मोठी होत गेली, माणसं छोटी झाली,

प्रत्येक दाराआड आपापला समाज आहे.


जिंकूनही रोज हरतो आपण स्वतःशीच आतून,

या जगण्याच्या खेळाला नेमका कुठला इलाज आहे?


चेहऱ्यावरच्या हास्याला फार अर्थ देऊ नको,

आत कुठे किती तुटलो, याचा कोणाला अंदाज आहे?