पाऊस आणि तुझ्या आठवणींत नातं काही खास असणार,
उगाच का मातीला तुझा गंध, थेंबांनी पैंजणांचा भास होणार?
पाऊस आणि तुझ्या आठवणींत नातं काही खास असणार,
उगाच का मातीला तुझा गंध, थेंबांनी पैंजणांचा भास होणार?
तुम मेरी नहीं, फिर भी ये ख़याल क्यों है,
तुम्हें खोने का दिल को मलाल क्यों है?
न कोई इकरार है, न कोई इनकार,
फिर तेरी आँखों में यूँ सवाल क्यों है?
माना मेरी हथेली पर तेरे नाम की लकीर न थी,
फिर तेरे बिना ये ज़िंदगी बेहाल क्यों है?
तेरा ज़िक्र छिड़े तो महफ़िल निखर जाती है,
तेरे ज़िक्र से ये महफ़िल बेमिसाल क्यों है?
सांग स्पष्ट ते, इशाऱ्यात बोलू नको
जमणार नाही उलगडणे कोडे मला
दाखवाया जगाला मंचावरती शेला दिला
मंचाखाली पायातले मारले जोडे मला
घालू शकणार नाही तू मोहिनी आता मला
कळू लागले तुझे डावपेच थोडे मला
मी ऐच्छिकतेने सर्व धर्म नाकारले
कोण तू, ठरवून एका जातीशी जोडे मला
काश किसी को सुनाने को कोई कहानी होती,
तेरी मेरी मुहब्बत की इक निशानी होती।
काश मिलती मुझे फिर से वो गुज़री हुई सहर,
शायद फिर से मेरी आँखों में रवानी होती।
काश मिल जाती मुझे दोपहर के वक़्त,
शायद न ढली मेरी जवानी होती।
बस तेरे कंधे पे सर होता और हाथों में हाथ,
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में शाम सुहानी होती।
काश वो ख़त भी कहीं आज मुझे मिल जाता,
जिसमें हर बात तेरी मेरी ज़ुबानी होती।
अगर पूछे कोई मुझसे मेरी ख़्वाहिश क्या है,
तेरे संग बीती हुई एक शाम पुरानी होती।
काश लौट आता वो मौसम तेरे आने का कभी,
जिसमें मेरी दुनिया में न वीरानी होती।
तुझे सारे रंग माझ्यात मिसळू दे
मी तुला माझा निळा रंग देतो
तू जिंकलेली बाजू घेऊन जा सारी
मी तुला हरण्याचा ढंग देतो
तुझ्या स्पर्शात शब्द हरवले ज्या क्षणी
मी तुला त्या क्षणाचा अभंग देतो
मी पुन्हा कधी लिहिलं असतं? तू नसतीस तर
इमरोझ कसा मी झालो असतो? तू नसतीस तर
तुझं नाव आलं की शब्द उमलतात सारे,
ही कविता कोणाची असती? तू नसतीस तर
जखमांनाही तू दिलीस एक हळुवारशी भाषा,
मी किती पोळलो असतो? तू नसतीस तर
रोज आरशात भेटणारा चेहरा माझा नव्हता,
मी कुणाचा चेहरा असतो? तू नसतीस तर
अब तुझसे भी नाराज़ हूँ मैं इसलिए,
तुझे देखा तो कोई और याद आया।
तेरे क़रीब था, फिर भी अजीब हालत थी,
पास रहकर भी कोई दूर याद आया।
तूने पूछा कि क्यों ख़ामोश हूँ इतना मैं,
क्या बताता कि कोई और याद आया।
तेरे आने से सजी महफ़िलें कुछ देर मगर,
तेरे जाने पर मुझे अपना घर याद आया।
अब किसी से भी शिकायत नहीं करता हूँ मैं,
जिससे रूठा था वही बार-बार याद आया।
तेरे क़दमों की आहट जब सुनाई दी मुझे,
किसी के लौटने का इंतज़ार याद आया।
तेरे जाने के बाद देर तलक सोचता रहा,
क्यों मुझे फिर वही इतवार याद आया।
जो सुनाती है मुझे चाँद-तारों की कहानी,
मैं उसको कहानी तेरी सुनाता हूँ।
वो कहती है, “भूल जाओ जो बीत गया है,”
मैं बीते हुए कल की ताज़गी सुनाता हूँ।
उसे यक़ीन है कि वक़्त सब भुला देता है,
मैं वक़्त के ही भीतर उसकी कमी सुनाता हूँ।
वो पूछती है, “मोहब्बत में क्या बचा आख़िर?”
मैं टूटे हुए दिलों की ज़िंदगी सुनाता हूँ।
वो मेरे सामने बैठा तो रहा देर तलक,
दरमियाँ फिर भी कोई हिजाब रहा।
उसने जाते हुए बस इतना कहा, “ठीक हूँ”,
उसके लहजे में मगर कुछ तो अज़ाब रहा।
रात भर नींद नहीं आई तो समझ में आया,
मेरे कमरे में भी उसका ख़्वाब रहा।
वक़्त गुज़रा तो कई ज़ख़्म भी भरते गए,
मगर एक चेहरा था जो दिल में बेहिसाब रहा।