Saturday, February 14, 2026

 मैंने तुम पर कविता लिखी है  

हालाँकि हो एक कविता तुम ख़ुद ही  

हाँ पर किसी गुलमोहर के नीचे  

मैंने तुम्हें पढ़ कर सुनाई नहीं  


तेरी ज़ुल्फ़ों को शाम न लिखा  

तेरे लबों को गुलाब न लिखा  

किसी रिवायत के मुताबिक़ मैंने तुझे  

चाँद भी न लिखा  


मैंने समंदर को तेरे क़िस्से सुनाए  

कई बार तेरा ज़िक्र किया  

लहरों को तेरी धुन से वाक़िफ़ किया  

रेत पर तेरा नाम लिखा  


हवाओं से भी राज़ साझा किया  

किसी शाम से बात छुपाई नहीं  

हाँ तुम्हें कभी ये कविता  

बस पढ़ कर सुनाई नहीं  


— विशाल


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