शायद
तुमने इस शहर के
उस मौसम को खो दिया
जो सबसे हसीन है
ये बहार, ये खुशबू तुम्हें पसंद आती
ये रंग तुम्हें अपने रंग में रंग लेते
कड़कती धूप में हम घर से निकलते
गुलमोहर की छाँव की बात करते
किसी टपरी पर चाय का गिलास हाथ लिए
ऊँची इमारतों की बात करते
ग़ज़लों पे, किताबों पे बात करते
हमारे इतने अलग ख़यालों पे बात करते
ख़ैर
अगले बरस ये मौसम फिर लौट आएगा
और
शायद तुम भी लौट आओ
~ विशाल
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