हक़ीक़त न सही, कम-से-कम ख़्वाब में मिले
वो मुझे किसी भूले जवाब में मिले
बहुत दिनों से चेहरे पे धूप ठहरी थी
वो एक शाम किसी नक़ाब में मिले
न पूछ हाल मेरा, बस इतना याद रहे
हम अपने-आप से थोड़े अज़ाब में मिले
वो एक लम्हा भी कितना अजीब लम्हा था
कि जैसे उम्र किसी एक किताब में मिले
मैंने चाहा था उसे सिर्फ़ एक बार मगर
वो बार-बार मेरे इंतिख़ाब में मिले
न जाने कौन-सा मौसम था उस मुलाक़ात का
कि उम्र भर के सभी रंग उस गुलाब में मिले
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