काश किसी को सुनाने को कोई कहानी होती,
तेरी मेरी मुहब्बत की इक निशानी होती।
काश मिलती मुझे फिर से वो गुज़री हुई सहर,
शायद फिर से मेरी आँखों में रवानी होती।
काश मिल जाती मुझे दोपहर के वक़्त,
शायद न ढली मेरी जवानी होती।
बस तेरे कंधे पे सर होता और हाथों में हाथ,
तेरी ज़ुल्फ़ों के साये में शाम सुहानी होती।
काश वो ख़त भी कहीं आज मुझे मिल जाता,
जिसमें हर बात तेरी मेरी ज़ुबानी होती।
अगर पूछे कोई मुझसे मेरी ख़्वाहिश क्या है,
तेरे संग बीती हुई एक शाम पुरानी होती।
काश लौट आता वो मौसम तेरे आने का कभी,
जिसमें मेरी दुनिया में न वीरानी होती।
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