तुम मेरी नहीं, फिर भी ये ख़याल क्यों है,
तुम्हें खोने का दिल को मलाल क्यों है?
न कोई इकरार है, न कोई इनकार,
फिर तेरी आँखों में यूँ सवाल क्यों है?
माना मेरी हथेली पर तेरे नाम की लकीर न थी,
फिर तेरे बिना ये ज़िंदगी बेहाल क्यों है?
तेरा ज़िक्र छिड़े तो महफ़िल निखर जाती है,
तेरे ज़िक्र से ये महफ़िल बेमिसाल क्यों है?
No comments:
Post a Comment