मैंने तुझसे तो बे-लौस ही तअल्लुक़ चाही,
तेरी जानिब से भी अपनी न कोई तस्दीक़ चाही।
तुझसे मोहब्बत की ये शिद्दत ही काफ़ी थी मुझे,
और न इस दिल ने कोई और तौफ़ीक़ चाही।
दिल ने हर ख़्वाब तेरे नाम से रौशन कर के,
ख़ुद से भी फिर न कोई और तहरीक़ चाही।
तेरे क़दमों की सदा में ही मुझे मिला सुकूँ,
और दुनिया से न कोई भी तरतीब चाही।
तू मिला तो लगा जैसे मिली हो मंज़िल मुझको,
और फिर तक़दीर से भी कोई न तदबीर चाही।
~ Vishal
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