मुझको भरम था इश्क़ है, दरिया का साहिल कहना,
दिल को मगर पड़ा है अब खुद से ही ग़ाफ़िल कहना।
आँखों से रात भर आँसू जो बेआवाज़ गिरे,
सुबह हुई तो उसे दर्द का हासिल कहना।
बाप ने सर पे हाथ जो रक्खा तो यूँ लगा,
उम्र भर उस ही लम्हे को रहा “काबिल” कहना।
महफ़िल में लोग थे, हर एक अपने में मगन,
हम ही को आ गया खुद को यहाँ जाहिल कहना।
दिल टूट के भी रहा उस ही गली में आख़िर,
अपनी ही ज़िद को ठहरा इश्क़ का क़ातिल कहना।
~ Vishal
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