Saturday, April 18, 2026

 तुमसे ख़्वाब में भी मुहब्बत गुनाह हो जाना

मेरे लब तक आना और फ़ना हो जाना


मेरी रूह का तेरे दर्द से राब्ता हो जाना

और फिर तेरी ख़ामोशी ही पनाह हो जाना


तेरी यादों का मेरी साँसों में बसना यूँ,  

जैसे हर धड़कन का कोई गवाह हो जाना।  


मेरी नज़्मों में कहीं भी तेरा ज़िक्र नहीं,

और खामोशियों में तेरा बयाँ हो जाना।


मैंने चाहा भी तुझे, और इन्कार भी रखा, 

ये मुहब्बत का अजब सा निज़ाम हो जाना।


मैं नज़्म था तेरा, जो लफ़्ज़ों में उतर न सका,

तू एक सफ़ह था - और मुझमें ही गुमाँ हो जाना।


~ Vishal

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