Saturday, March 21, 2026

हर पल का हिसाब रखा

तेरी आमद के लिए

पर मेरे इंतजार का

कोई हिसाब नहीं मिला


किताबों के ढेर में

हर मौसम, बहार मिली

पर किसी किताब में

सूखा गुलाब नहीं मिला


उसने ख़त में अपने सारे

जज़्बात लिख दिए

बस मेरे सवाल का

कोई जवाब नहीं मिला


नज़र ने ढूँढा जिसे

वो इंतख़ाब नहीं मिला

वो शख्स तो मिला मगर

उसका हिजाब नहीं मिला


~ Vishal

Wednesday, March 18, 2026

 मुझे तुझ से यूँ तो

कोई शिकायत नहीं है फिर भी

मैं भी आज तुझ से

बेवजह रूठ कर देखूँ


यूँ तो मुझे रक़ीब पे

ज़्यादा यक़ीन है लेकिन

चल तेरी दोस्ती पे भी

एक दाँव लगाकर देखूँ


ख़ुदा के मौजूदगी पे

यक़ीन नहीं है मुझको

चलो तुम्हारी ख़ातिर

मुनाजात भी कर के देखूँ


मैं तुझे न पुकारूँ

बस याद कर के देखूँ

या अपनी तन्हाई को

एक शम्स बनाकर देखूँ


~ Vishal


Sunday, March 15, 2026

 मुझे लगता है कि क़लम से काग़ज़ पर कविता लिखना

बस एक रिवायत है,

असली कविता तो प्रेमी के लबों से

प्रेमिका की नंगी पीठ पर लिखी जाती है।


ना कोई स्याही,

ना किसी पन्नों की सरसराहट,


सिर्फ़ साँसों की गर्मी

और दिल की आहट।


क्योंकि कविता पढ़ी नहीं,

महसूस की जाती है।


~ Vishal

Sunday, March 8, 2026

 शायद

तुमने इस शहर के

उस मौसम को खो दिया
जो सबसे हसीन है

ये बहार, ये खुशबू तुम्हें पसंद आती
ये रंग तुम्हें अपने रंग में रंग लेते

कड़कती धूप में हम घर से निकलते
गुलमोहर की छाँव की बात करते

किसी टपरी पर चाय का गिलास हाथ लिए
ऊँची इमारतों की बात करते

ग़ज़लों पे, किताबों पे बात करते
हमारे इतने अलग ख़यालों पे बात करते

ख़ैर
अगले बरस ये मौसम फिर लौट आएगा
और
शायद तुम भी लौट आओ


~ विशाल

Saturday, February 14, 2026

 मैंने तुम पर कविता लिखी है  

हालाँकि हो एक कविता तुम ख़ुद ही  

हाँ पर किसी गुलमोहर के नीचे  

मैंने तुम्हें पढ़ कर सुनाई नहीं  


तेरी ज़ुल्फ़ों को शाम न लिखा  

तेरे लबों को गुलाब न लिखा  

किसी रिवायत के मुताबिक़ मैंने तुझे  

चाँद भी न लिखा  


मैंने समंदर को तेरे क़िस्से सुनाए  

कई बार तेरा ज़िक्र किया  

लहरों को तेरी धुन से वाक़िफ़ किया  

रेत पर तेरा नाम लिखा  


हवाओं से भी राज़ साझा किया  

किसी शाम से बात छुपाई नहीं  

हाँ तुम्हें कभी ये कविता  

बस पढ़ कर सुनाई नहीं  


— विशाल


Thursday, February 5, 2026


ऐसा क्यूँ हो
कि मैं तुम पर ही कविता लिखूँ

ऐसा क्यूँ हो
कि मुझे
तेरे ख़यालों में ही
शब्द मिले

ऐसा क्यूँ हो
कि तेरी बेमौजूदगी
खलने लगती है

ऐसा क्यूँ हो
कि मेरा होना भी
बेमालूम सा
लगता है

ऐसा क्यूँ हो
कि तुम्हारा
दो लफ़्ज़ों का ख़त
मायने रखता है

ऐसा क्यूँ हो
कि मैं
उस ख़त का
जवाब
न दे पाऊँ

ऐसा क्यूँ हो
कि
“तुम कैसी हो”
ये पूछना भी
इतना मुश्किल है

ऐसा क्यूँ हो
कि
“अपना ख़याल रखना”
ये कहना भी
आसान
नहीं