Saturday, February 14, 2026

 मैंने तुम पर कविता लिखी है  

हालाँकि हो एक कविता तुम ख़ुद ही  

हाँ पर किसी गुलमोहर के नीचे  

मैंने तुम्हें पढ़ कर सुनाई नहीं  


तेरी ज़ुल्फ़ों को शाम न लिखा  

तेरे लबों को गुलाब न लिखा  

किसी रिवायत के मुताबिक़ मैंने तुझे  

चाँद भी न लिखा  


मैंने समंदर को तेरे क़िस्से सुनाए  

कई बार तेरा ज़िक्र किया  

लहरों को तेरी धुन से वाक़िफ़ किया  

रेत पर तेरा नाम लिखा  


हवाओं से भी राज़ साझा किया  

किसी शाम से बात छुपाई नहीं  

हाँ तुम्हें कभी ये कविता  

बस पढ़ कर सुनाई नहीं  


— विशाल


Thursday, February 5, 2026


ऐसा क्यूँ हो
कि मैं तुम पर ही कविता लिखूँ

ऐसा क्यूँ हो
कि मुझे
तेरे ख़यालों में ही
शब्द मिले

ऐसा क्यूँ हो
कि तेरी बेमौजूदगी
खलने लगती है

ऐसा क्यूँ हो
कि मेरा होना भी
बेमालूम सा
लगता है

ऐसा क्यूँ हो
कि तुम्हारा
दो लफ़्ज़ों का ख़त
मायने रखता है

ऐसा क्यूँ हो
कि मैं
उस ख़त का
जवाब
न दे पाऊँ

ऐसा क्यूँ हो
कि
“तुम कैसी हो”
ये पूछना भी
इतना मुश्किल है

ऐसा क्यूँ हो
कि
“अपना ख़याल रखना”
ये कहना भी
आसान
नहीं